२२ अप्रैल” विश्व पृथ्वी दिवस” के संदर्भ में –
“ पीड़ा पृथ्वी की”
मैं पृथ्वी बोल रही हूं
अनगिनत घावों की पीडा में
मन के आंसू घोल रही हूं
मैं पृथ्वी बोल रही हूं।
हरियाली की चादर जर्जर,
तपती गर्म हवाओं का डर
पथरीले पथ पर डगमग पग,
बिना त्राण के डोल रही हूं
मैं पृथ्वी बोल रही हूं।
तन का लहू पिलाकर पाला
सुख स्वप्नों में देखा भाला
सुखद छांव दी तरु-विटपों की
सुरभित कर जीवन का प्याला
पर अपने जाये बेटों ने
श्वेताभा से तन रंग डाला
रंगहीन आंचल संभालती
यात्रा पथ पर घूम रही हूं
मैं पृथ्वी बोल रही हूं।
-डॉ दक्षा जोशी
गुजरात ।
